Thursday, June 16, 2011

उर की जो व्यथा है वही कविता है

दीनों  के  घर  में  उजाला  करे  चाहे  छोटा सा दीप वही सविता है |
प्यासों  की  प्यास बुझाये सदा   भरा  कीच तलाव  वही सरिता है |
न्याय  के  संग चले  जो  सदा   न झुके जो कभी नर सो नर सा है |
कवि से कविताई न पूँछो सखे  उर की जो व्यथा है वही कविता है |

47 comments:

  1. कवि से कविताई न पूँछो सखे उर की जो व्यथा है वही कविता है
    सटीक परिभाषा कविता की.
    सुन्दर पंक्तियाँ हैं.

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  2. वियोगी होगा पहला कवि
    आह से उपजा होगा गान ..

    सुन्दर प्रस्तुति

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  3. वाह ... बहुत खूब कहा है आपने ..।

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  4. कवि से कविताई न पूँछो सखे उर की जो व्यथा है वही कविता है

    बेहद सटीक चित्रण्।

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  5. उर की जो व्यथा है वही कविता है।

    सुन्दर अति सुन्दर।

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  6. कवि से कविताई न पूँछो सखे उर की जो व्यथा है वही कविता है |

    गहन अनुभूतियों और जीवन दर्शन से परिपूर्ण इस रचना के लिए बधाई....

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  7. आपकी छोटी सी रचना अपने अन्दर बहुत सारी भावनाओं को समेटे हुए है

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  8. जो वक़्त पर काम आये , वही मित्र है । जो प्यास बुझाए वही सरिता है और जो ह्रदय से उपजे वही कविता है ।
    बेहतरीन रचना।

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  9. aankhon se jo bhi aansu bahega , kuch to kahega ... aur tab kavi hoga sunanewala

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  10. उर की जो व्यथा है वही कविता है.....

    बहुत सुन्दर....थोड़े से शब्दों में बहुत सी बातें कह दी आपने...

    मेरी "कविता" भी कुछ कहती है...
    " कविता केवल कविता नहीं होती है,
    हर कवि के मन का दर्पण होती है..
    जब वो रोता है तो रोती भी है,
    और हँसता है तो हंसती भी है,
    कभी ये रोटी को तरसती भी है,
    कभी बरखा बन के बरसती भी है,
    कभी फूल बन के महकती भी है,
    कभी शूल बन के चुभती भी है,
    ये युवा मन की शक्ति भी है,
    और कभी ईश्वर की भक्ति भी है,
    कभी इसमें कोमल सी प्रीति भी है,
    और कभी जग से विरक्ति भी है,
    कभी इसमें उजाला, अँधेरा भी है,
    कभी इसको जुल्मों ने घेरा भी है,
    कभी इसमें अहसास मेरा भी है,
    कभी इसमें तेरा बसेरा है,"

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  11. जी, कविता तो वास्तव में ह्रदय की ही व्यथा है

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  12. उर की व्यथा ही कविता है....

    कविता की इससे बेहतर परिभाषा नहीं हो सकती।
    बहुत सुंदर, सुरेन्द्र जी।

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  13. kam shabdo me sampurn kavita kaa bakhan yahi to kavita hai bahut khub likha hai aapne

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  14. BAHUT KHUB LIKHA HAI SIR JI APNE. . . ISE HE KAHTE HAIN GAGAR ME SAGAR.
    JAI HIND JAI BHARAT

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  15. सुरेन्द्र सिंह "झंझट" जी -उर कि जो व्यथा है वही कविता है -
    बहुत खूब कही -
    वियोगी होगा पहला कवि,आह से निकला होगा गान
    निकल कर अधरों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान .

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  16. सौ प्रतिशत हकीकत है- उर की व्यथा ही कविता है. बेहतरीन रचना के लिए बधाई और शुभकामनाएं .

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  17. उर कि जो व्यथा है वही कविता ह
    बहुत सुन्दर एवं सत्य

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  18. सुन्दर और सत्य कहना ही सही है बिना व्यथा के कविता कहां

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  19. बहुत सुंदर भाव लिए रचना। उर की जो व्यथा कहे, कविता है!

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  20. दीनों के घर में उजाला करे चाहे छोटा सा दीप वही सविता है ......
    संक्षिप्त सी रचना किन्तु सटीक चित्रण्।
    आभार उपरोक्त पंक्तियों को साझा करने हेतु .........

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  21. शानदार् रचना

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  22. उर की जो व्यथा है वही कविता है

    वाह क्या बात है.
    एकदम सही कहा है आपने.

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  23. उर की व्यथा है वही कविता है...सच

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  24. सुन्दर प्रस्तुति, सटीक चित्रण्।

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  25. शानदार कवित्त .मध्य कालीन नीति परक कवित्त सवइया याद आ गया .

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  26. झंझट जी यह तो गागर में सागर जैसी बात हुयी ! बहुत सठिक.

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  27. सुन्दर प्रस्तुति, गागर में सागर , वाह,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  28. उर की जो व्यथा है वही कविता है |
    bahut hi badhiya rachna

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  29. उर की व्यथा ही तो कविता होती है, सौ फीसदी सही|

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  30. उर की व्यथा---- सुन्दर भाव
    गीत गज़ल लिख वक्त गुजारें तन्हाई के मारे राम । शुभकामनायें।

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  31. दीनों के घर में उजाला करे चाहे छोटा सा दीप वही सविता है

    सुंदर भाव पिरोए कविता.

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  32. चंद शब्दों में ही गहरी बात कह डाली. कभी कुछ कहना भी बहुत कुछ कह जाता है.

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  33. AApki Baat pasand aayi! keval chaar panktiyon men hi aapne itna kuch kah diyaa!

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  34. भाई सुरेन्द्र जी सबसे पहले आपके बेहतरीन कमेंट्स के लिये बधाई फिर आपकी कवित्त के लिये बधाई और शुभकामनाएं |

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  35. बहुत सुंदर भाव लिए रचना।मेरे ब्लॉग पर आ कर मेरा होंसला बढाए !
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  36. वाह...वाह...वाह....

    क्या कहूँ.... एक एक पंक्ति की सौ सौ बलैयाँ ली हैं मैंने...फिर भी मन नहीं भर रहा....

    अद्वितीय....अप्रतिम....वाह....

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  37. कविता को ४ पंक्तियों में बखूबी परिभाषित किया है. भई वाह !!!!!!

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  38. सुरेन्द्र जी बहुत ही सटीक प्यारे बोल इस रचना में -सत्य और सुन्दर

    न्याय के संग चले जो सदा न झुके जो कभी नर सो नर सा है |

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  39. बहुत सुन्दर भाव, बहुत सुन्दर शब्द
    आपके उर की गहराइयों से प्रकट हो रहे हैं.
    सीधे दिल में ही उतर रहें हैं.

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  40. हम कविता को जितने तरीकों से परिभाषित करते हैं , वे कविता की सीमाओं को बंधने का प्रयास भर है. जबकि कविता हमेशा अपरिभाषित है, लगभग हमारे अप्रकाशित जीवन की तरह.


    अव्यवस्था के खिलाफ जोर का झटका धीरे से

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  41. कवि से कविताई न पूँछो सखे उर की जो व्यथा है वही कविता है
    सटीक परिभाषा कविता की.
    चंद शब्दों में ही बहुत कुछ कह डाली. शुभकामनायें।

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