Tuesday, November 23, 2010

गीत....अंधियारा जीता हूँ

इक सूनापन , इक सन्नाटा ,इक अँधियारा जीता हूँ |
भरा-भरा सा लगता जग को फिर भी रीता-रीता हूँ |
             सूरज की किरणें तो  थककर
             वापस  लौट  गयीं अपने  घर |
             शीतल स्निग्ध चांदनी भी तो
             कर न सकी उजियारा अंतर |
अमृत है , मदिरा कि हलाहल पीकर जिसको बहक रहा,
दहक  रहा  पर   जान  न   पाता  मरता हूँ  या   जीता हूँ |
              इक कोलाहल  सा  उठता है
              इक  तूफ़ान  भयंकर  आता |
              खो जाती सपनों की दुनिया
              एक सुहाना घर ढह    जाता |
चारों ओर  भीड़ है  लेकिन  एक  अकेला   पथराया सा ,
सूनी-सूनी   आँखों  से    बस    इक   सन्नाटा   पीता   हूँ   |
              स्मृतियाँ  भी नागफनी   सी
              उर के घावों  को   सहलातीं |
              चीर-चीर कर पीर ह्रदय की
              एक  अनोखा  सुख दे  जातीं |
लिपट-लिपट कर मैं भुजंग सा चन्दन की शीतलता चाहूँ
ताप    समेटे    उर   के   घावों     को     शब्दों   से    सीता हूँ |








16 comments:

  1. स्मृतियाँ भी नागफनी सी
    उर के घावों को सहलातीं |
    चीर-चीर कर पीर ह्रदय की
    एक अनोखा सुख दे जातीं

    बहुत खूबसूरत गीत है ....सच को कहती हुई पंक्तियाँ हैं ..

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  2. मुझे भी वही पंक्तियाँ पसंद आईं जो संगीता जी को आईं हैं...
    बहुत भी मोहक रचना..

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  3. स्मृतियाँ भी नागफनी सी
    उर के घावों को सहलातीं |
    चीर-चीर कर पीर ह्रदय की
    एक अनोखा सुख दे जातीं

    yea line aur sabhi se kuch jayada hi behtarin hai. sunder rachna.

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  4. ताप समेते उर के घावों को शब्दों से सीता हूं।
    सुन्दर रचना बधाई।

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  5. चारों ओर भीड़ है लेकिन एक अकेला पथराया सा ,
    सूनी-सूनी आँखों से बस इक सन्नाटा पीता हूँ |

    बहुत खूबसूरत कविता!

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  6. हर एक पंक्ति बहुत उम्दा. किसी एक पंक्ति को टेग करना मुश्किल. शुक्रिया.
    ---
    कुछ ग़मों के दीये

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  7. गीत उम्दा है। बधाई।

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  8. sangeetaji,poojaji,sharadji,Dr santay dani sahab,amit bhai,sahil bhai,sagar sahab!
    blog par aane aur apni bahumooly tippadiyon
    se utsahvardhan karne ke liye hardik aabhar!

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  9. आपकी इस पोस्ट का लिंक कल शुक्रवार को (२६--११-- २०१० ) चर्चा मंच पर भी है ...

    http://charchamanch.blogspot.com/

    --

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  10. स्मृतियाँ भी नागफनी सी
    उर के घावों को सहलातीं |
    चीर-चीर कर पीर ह्रदय की
    एक अनोखा सुख दे जातीं |
    लिपट-लिपट कर मैं भुजंग सा चन्दन की शीतलता चाहूँ
    ताप समेटे उर के घावों को शब्दों से सीता हूँ |

    यही तो होता है जितना चाहे भाग लो स्मृतियाँ पीछा नही छोडतीं……………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

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  11. वाह...वाह...वाह....

    लाजवाब !!!!

    मर्म को छूती भावुक प्रवाहमयी अतिसुन्दर रचना...

    मन मुग्ध कर गयी ...वाह !!!

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  12. भरा-भरा सा लगता जग को फिर भी रीता-रीता हूँ |
    हृदयस्पर्शी !!!
    सुन्दर गीत!

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  13. भरा-भरा सा लगता जग को फिर भी रीता-रीता हूँ |

    गहन संवेदनाओं की बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  14. सूरज की किरणें तो थकक वापस लौट गयीं अपने घर |
    शीतल स्निग्ध चांदनी भी तो
    कर न सकी उजियारा अंतर |
    अमृत है , मदिरा कि हलाहल पीकर जिसको बहक रहा,
    दहक रहा पर जान न पाता मरता हूँ या जीता हूँ |

    बहुत खूबसूरत गीत है .

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