Monday, February 21, 2011

लोकतंत्र को निगल गया भ्रष्टाचार का अजगर ..

हाँ ! मैं देख रहा हूँ | क्या आपने नहीं देखा ? आप भी देख रहे हैं | हम सब देख रहे हैं , मगर तमाशबीन की तरह | कुछ करना  भी चाहें तो क्या करें ? सिर्फ हो-हल्ला ही तो मचा सकते हैं | मचा भी रहे हैं मगर कोई असर नहीं |
हाँ , तो हम सबने देखा - काफी समय पहले से जिस भ्रष्टाचार के भीमकाय भयंकर अजगर ने  देश के लोकतंत्र को निगलना शुरू किया था , अब पूरा का पूरा निगल गया - सिर से पाँव तक ! लोकतंत्र अब अजगर के पेट में है | वह अजगर की आँखों से ही थोडा-बहुत बाहर देख लेता है , उसी की साँस पर जिन्दा है ,बाहर आने को छटपटाता है | अजगर के पेट में फँसा बेचारा हाथ-पाँव मारता है मगर दूसरे ही पल आँखें मूँद लेता है | एक आम आदमी की तरह मौत से जूझ रहा है - बेचारा बेबस लोकतंत्र ! लगता है कि अब जान गई कि तब , पर दूसरे ही क्षण वह फिर हरकत में आ जाता है | मृतप्राय है पर जिजीविषा बाकी है |
     क्या कोई चमत्कार होगा ? कोई मसीहा आएगा इसे बचाने ? कौन फाड़ेगा अजगर का पेट ? पेट फाड़कर लकवाग्रस्त हो चुके लोकतंत्र को बड़ी सावधानी से बाहर निकालेगा,उसके क्षतिग्रस्त अंगों की मरहम-पट्टी  करेगा , खुली हवा में बाहर घुमायेगा | धीरे-धीरे घायल लोकतंत्र स्वस्थ हो जायेगा | तब वह बेचारा नहीं रहेगा  |
अगर फिर कभी अजगर  उसे दुबारा निगलने का प्रयास करेगा तो वह अपनी चारों बलिष्ठ भुजाओं से उसके जबड़ों को पकड़कर फाड़ देगा | भ्रष्टाचार का अजगर हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगा | लोकतंत्र की घर-गृहस्थी फिर से बसेगी, उसके आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजेगी और वह बड़ी शान से सीना चौड़ा करके पूरे संसार को अपनी बलिष्ठता और स्वतंत्रता की चुनौती  देगा |





20 comments:

  1. हम सब देख रहे हैं ,
    aapne sahi kaha sir ji
    halat bahut kharab he

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  2. hum sab aankh hote huye bhi andhe hain, kaan haote huye bahre

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  3. पता नही कब क्या होगा?

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  4. कुछ पंक्तियाँ याद आई है -
    अपनी भी सायकिल है समाजवाद देश का ,
    पंक्चर कभी है तो कभ ब्रेक फेल हैं ..........
    लोकतंत्र को निगल गया भ्रष्टाचार का अजगर ..चिंतनीय विषय,
    आभार............

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  5. असंख्य हृदयों की पीड़ा शब्दों में टांक दी आपने...

    सचमुच सभी यही अभिलाषा धारे हुए हैं...

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  6. फिलहाल तो अजगर के पेट में ही दिख रहा है । शायद कोई चमत्कार हो जावे ?

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  7. बहुत ही गंभीर विषय.
    मौन से काम न चलेगा.
    सलाम

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  8. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई स्वीकार करें .
    आइये हमारे साथ उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन पर और अपनी आवाज़ को बुलंद करें .कृपया फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये

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  9. सबसे बड़ी बात है कि अजगर का पेट फाड़ेगा कौन।

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  10. "लोकतंत्र अब अजगर के पेट में है"
    बड़ा सही वाक्य इस्तेमाल किया है आपने. अजगर कोई और नहीं ये सब नेता गण हैं..

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  11. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई स्वीकार करें

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  12. ब्लॉग लेखन को एक बर्ष पूर्ण, धन्यवाद देता हूँ समस्त ब्लोगर्स साथियों को ......>>> संजय कुमार

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  13. कोई मसीहा नही आयेगा, हमे ही पहल करनी होगी
    सार्थक लेखन के लिए शुभकामनाये

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  14. मुझे लगता है कि भ्रष्टाचार के अजगर और लोकतंत्र की पुरानी दोस्ती है. कहीं कोई समस्या नज़र नहीं आती. सब वैसा ही चल रहा है. बधाई.

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  15. न चमत्कार होता दिख रहा है...न मसीहा आता...हम जब तक अपने घर का कचरा पड़ोसी के दरवाज़े पर डालते रहेंगे तब तक हम मिलजुल कर कोई अलख नहीं जगा सकते हैं...मेरे कहने का आशय ये हैकि पहले बुनियाद दुरुस्त होनी ज़रूरी है।

    आपने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया...
    आपके लिए दुष्यंत के यह शेर -

    कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता
    एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो ।

    आपने तबीयत से पत्थर उछाला है....बधाई ।

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  16. डॉ.(मिस)शरद सिंह जी के विचारों से मै पूर्ण सहमत हूँ.इस अजगर को पाला पोसा भी तो हमही ने था .और आज भी इसको किसी न किसी प्रकार से बढ़ावा भी हमही से मिल रहा है इसको. हम जब खुद अन्धकार से प्रकाश की और बढ़ने का प्रयत्न करेंगे तभी कुछ हल संभव है .समय कभी एकसा नहीं रहता .जब जागृति और चेतना विकसित होती जाती है तो विकट से विकट परिस्थिति भी सरल हो
    ने लगती है..इतिहास इस बात का गवाह है ,फिर चाहे वह भक्ति युग हो या ब्रिटिश शासन या आज का युग .सोच को जाग्रत करनेवाली कृति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई .

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  17. लोकतंत्र एक मेट्रिक्स है जो हम आम आदमी के बेब्कुफ़ बनाने के लिए बनायीं गयी है

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