जीवन में संघर्ष करते-करते जब कभी हिम्मत हारने लगती है तो किसी महान व्यक्तित्व की प्रेरणा पुनः साहस जगा देती है | अगर न्याय की लड़ाई लड़ी जाये तो इसमें हार-जीत कोई विशेष मायने नहीं रखते मगर शर्त यह है कि इस लड़ाई में स्वार्थ हावी न हो | जनऔर समाज के हित के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता | मेरा तो सदा से यही उद्देश्य और विचार रहा है कि गाँव को लुटेरों के चंगुल से छुडाया जाये | गाँव से समाज और देश तक हावी भ्रष्टाचारियों और भ्रष्ट व्यवस्था के मकडजाल को नोच डाला जाये | यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि सम्पूर्ण प्रबुद्ध वर्ग की है | इस लड़ाई को तभी जीता जा सकता है जब आम अल्पशिक्षित-अशिक्षित जनता को उसके अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने का अनवरत अभियान चलाया जाये | यह हमारे गावों का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है कि हमारे युवाओं में से ७० प्रतिशत तक शराब व अन्य नशाओं के आदी हो चुके है | जिनसे गाँव के , समाज के ,देश के उत्थान की उम्मीद थी उन्हें नशे की भट्ठी में झोंककर भ्रष्टाचार का हथियार बनाया जा रहा है | गाँव-समाज का प्रबुद्ध वर्ग या तो मौन होकर मात्र अपने तक सीमित होकर रह गया है या भ्रष्टाचार का ही अंग बन गया है | ऐसे में परिवर्तन कहाँ संभव है ? दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ यही तो कहतीं हैं--
" माना मेरे दिल में नहीं आपके दिल में सही
हो किसी भी दिल में लेकिन आग जलनी चाहिए "
खैर मुझे तो एक महान व्यक्तित्व श्री अटल बिहारी बाजपेयी जो ४० वर्षों तक विपक्ष में रहे और मात्र ६ वर्षों तक सत्ता में ,की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ सदैव प्रेरणा देती रही हैं ----
गीत नया गाता हूँ
टूटी हुई वीणा से फूटे बासंती सुर|
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर|
झरे सब पीले पात , कोयल की कुहुक रात,
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ | गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपनों की सुनी नहीं सिसकी |
अंतर की व्यथा-कथा अधरों पर ठिठकी |
हार नहीं मानूंगा , रार नहीं ठानूंगा ,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ | गीत नया गाता हूँ