चौराहे पर खड़ा कबीरा अलख जगाए रे |
सारी दुनिया पागल समझे हँसी उड़ाए रे |
राम-रहीम नाम पर ठेकेदारी होती है |
बेबस इंसानियत तो सौ-सौ आंसू रोती है |
नफरत की पौधें रोपी जातीं निर्मल मन में ,
मात्र स्वार्थ की इस समाज में खेती होती है |
ढाई आखर हलक में जैसे डंक चुभाए रे |
सारी दुनिया पागल समझे हँसी उड़ाए रे |
देशप्रेम की ढोल पीटते जाफ़र औ जैचंद |
गद्दारों ने देश की पूँजी किया बैंक में बंद |
उजले कपड़ों में काले दिलवाले हैं अगुआ ,
भांडों की चाँदी, भूषण के मूक हो रहे छंद |
'वीरों का कैसा बसंत ?' कोई याद दिलाए रे |
सारी दुनिया पागल समझे हँसी उड़ाए रे |
लोकतंत्र घायल वोटों के चक्कर-मक्कर में |
देश दाँव पर लगा है बस कुर्सी के चक्कर में |
नैतिकता का दामन चिंदी-चिंदी है देखो ,
खिंची हुई तलवारें घोटालों के चक्कर में |
'चारा' तो कोई ताजमहल की ईंट चबाए रे |
सारी दुनिया पागल समझे हँसी उड़ाए रे |
नेता-पुलिस-माफियाओं के पक्के रिश्ते हैं |
इनकी चक्की में गरीब-बेबस ही पिसते हैं |
ऊँची कुर्सी मिलती है गुंडों-दादाओं को ,
निर्दोषों पर ही कानून शिकंजे कसते हैं |
रामराज में भी सीता निर्वासन पाए रे |
सारी दुनिया पागल समझे हँसी उड़ाए रे |
ट्राफिक-पुलिस भरी सड़कों पर हफ्ता करे वसूल |
डंडों के बल चलता थानों का अंग्रेजी- रूल |
नेताओं के चमचों की ही दखलंदाजी से ,
जंगलराज रहा है देखो सरेआम फल-फूल |
सत्तालोभी , आदर्शों की ढोल बजाएँ रे |
सारी दुनिया पागल समझे हँसी उड़ाए रे |
वोटों के सौदागर सब कुछ जानके हैं अनजान |
इक दूजे पर कीचड़ फेंकें कितने हुए महान !
जनता तो मुहरा है , इनको कुर्सी हासिल हो -
फिर तो देश रहे या जाये याकि बने शमसान |
कोई इनके हाथों में दर्पण पकड़ाए रे |
इनका असली चेहरा तो इनको दिखलाये रे |
चौराहे पर खड़ा कबीरा अलख जगाए रे |
सारी दुनिया पागल समझे हँसी उड़ाए रे |