Monday, January 24, 2011

नेता हमें सुभाष चाहिए........ (सुभाष जयंती -२३ जनवरी पर )

देश तो है आज़ाद मगर आज़ादी का आभास चाहिए
                                   नेता हमें सुभाष  चाहिए 

      एक अकेले   अपने  बल पर  जिसने   लड़ी  लड़ाई 
     'आजाद हिंद' के नायक ने खुद अपनी फ़ौज बनाई 
     'दो मुझे खून-आज़ादी दूंगा'   वीर- बाँकुरा   बोला  
     सुनकर  हर   हिन्दुतानी  ने   रँगा    बसंती चोला 
 आज़ादी के लिए समर्पित जीवन की हर साँस चाहिए
 साँस-साँस में देशप्रेम का भाव भरा उच्छ्वास  चाहिए 
                                      नेता हमें सुभाष चाहिए

     आज देश का लोकतंत्र  है फँसा हुआ  दलदल में
     बस कुर्सी हासिल करने की होड़ लगी हर दल में 
     क्रांतिकारियों के   सपनों का   भारत वर्ष कहाँ है 
     मातम ही मातम है    आज़ादी का  हर्ष  कहाँ है 
 उजड़े हुए  चमन में   फिर   से लहराता   मधुमास  चाहिए
 जय 'जय हिंद 'से गुंजित फिर से धरा और आकाश चाहिए 
                                              नेता हमें सुभाष चाहिए   
   


Friday, January 21, 2011

अब इंतज़ार किसका है ?

आशा के उपवन में
बरस पड़े प्रस्तर खंड
अंतस का भाव-भवन
हो गया खण्ड-खण्ड
चिर प्रतीक्षित काल
आया तो ऐसा.....अब इंतज़ार किसका है ?

खिलने से पहले ही
कलियों पर वज्रपात
सस्मित सुमनों के
हँसते ही आघात
कांपती-लरजती बेलि
का अवलंब अब
हो रहा ठूंठ सा
आते ही लौट गया
मधुरिम बसंत
 किन्तु
खेल रहा दुसह खेल
उन्मत्त पतझार
फूलों की लाश पर
हँसता शमसान ....अब इंतज़ार किसका है ?

कविता की सरस धार
पथरीली राहों की
सहती अनवरत मार
कंठ में ही सूख गयी
बूँद-बूँद करके अब
खोल रही
पलकों के बंद द्वार
एक अनजाना भाव
पूंछता जिजीविषा से ..इंतजार किसका है ?
                       .....अब इंतज़ार किसका है ? 
  

Wednesday, January 19, 2011

होय बारह बजे भिनसार ....

(अभी तक मैंने इस ब्लॉग पर जो भी पोस्ट किया - गीत, कविता ,लेख ,हास्य -व्यंग , मुक्तक ,ग़ज़ल आदि सब खड़ी बोली की  रचनाएँ हैं | आज मेरे मन में  अवधी के लालित्य से परिपूर्ण एक पुराने 'जाड़ा गीत' की  कुछ पंक्तियाँ अनायास ही आ गयीं , मोह संवरण न कर सका | आज वही - इस ब्लॉग पर अवधी की पहली रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ | )

कांपि गवा हड्डी कै ढाँचा कट-कट  बोलैं दाँत
हाथ-पाँव सब सुन्न होइ गवा जाड़ा कै उत्पात
           होय बारह बजे भिनसार , उठे हैं बाबूजी
           लाख कोस होइगा दुआर  , उठे हैं बाबूजी

गरम नाश्ता चाय चाहिए पड़े-पड़े  चरपाई
छूटि जाय संसार मुला न छूटै गरम रजाई
          कोऊ बाँधि गवा पाँव मा पहार ,उठे हैं बाबूजी
          लाख   कोस   होइगा दुआर ,उठे हैं    बाबूजी

भोर नहान जानि पंडितजी  हाथ-पाँव  सब सूजा
यक लोटा पानी मा होइगा स्नान,ध्यान औ पूजा
          करैं जोर-जोर राम कै पुकार ,उठे हैं बाबूजी
          लाख कोस  होइ   गा दुवार,   उठे हैं बाबूजी

राति-बिराति द्वार जौ खटकै मुश्किल होइगा उठना
धोती कौन बिसात   हारिगा  यहिसे  ऊनी   सुथना
                कांपै थर-थर देहियाँ कै भार, उठे हैं बाबूजी
               लाख कोस  होइगा  दुवार,  उठे हैं   बाबूजी

झूरि लकड़िया हरियर होइगय चलिगय मस्त बयरिया
पियर  चुनरिया   धरती पहिरे    फूलि  रही सरसोइया
                    ऋतुराज खटकावें दुआर , उठे हैं    बाबूजी
                    होय बारह बजे  भिनसार , उठे हैं   बाबूजी

Friday, January 14, 2011

जो कहना है कहते जाएँ

क्यों उलझें  हम शब्दजाल में  | 
 सुलझे-अनसुलझे    सवाल   में |
सागर की लहरों पर चढ़कर ,
चल  पानी  सा    बहते    जाएँ | जो कहना है कहते जाएँ
आग लगी है   नंदन वन   में   |
ताप-ताप हर घर आँगन में |
जलते   जीवन  की   बेला में ,
कैसे    राग मल्हार     सुनाएँ | गर दहना है दहते जाएँ
फूलों   में   तेज़ाब      भरा  है |
फिर भी उपवन  हरा-भरा है |
भँवरों की साजिश में फँसती ,
तितली को  कैसे    समझाएँ | सिर धुनना है धुनते जाएँ
सूनी   माँग    दर्द     ढोती  है |
सुन्दरता    बेबस     रोती   है |
चेहरे  पर   मरुथल  फैला है ,
फिर   कैसे    श्रृंगार   सजाएँ | बहते नैना बहते जाएँ
भावों  का    पंछी    बेपर   है |
और    कल्पना  भी बेघर है |
शब्द   हो   गए     गूंगे-बहरे ,
कैसे  कोई   गीत     सुनाएँ | जो सहना है सहते जाएँ 

Monday, January 10, 2011

कैसे अपना गाँव बचे अब कैसे अपना देश ?

कैसे अपना गाँव बचे अब कैसे अपना देश ?
      जुर्म दहेजी प्रथा कागजी बंधन दिया बनाय |
      अख़बारों की सुर्खी देखो   बहुएँ  रहे जलाय |
लाखों में दूल्हों की बिक्री  ऊपर से  परहेज ?
कैसे अपना गाँव बचे अब कैसे अपना देश ?
     नित्य निमंत्रण बाँट-बाँट वे करवाते हैं भोज |
     घर के बच्चे भूँखों मरते मना रहे हम मौज |
घर की शांति खोजने जाते हैं हम  रोज विदेश |
कैसे अपना गाँव बचे   अब    कैसे   अपना देश ?
     मद्यपान विषपान सरीखा  कहता  एक   विभाग |
     नित्य नयी ठेकी शराब की फ़ैल रही है आग |
आग लगाकर कुँवा खुदाते हैं  काले अंग्रेज |
कैसे अपना गाँव बचे अब कैसे अपना देश ?
     बालवर्ष में मरा भूख से सुरसतिया का लाल |
     युवावर्ष में कटा रेल पर पढ़ा-लिखा धनलाल |
महिलावर्ष नदी में कूदी धनिया बिखरे केश |
कैसे अपना गाँव बचे अब कैसे अपना देश ?
     इक्कीसवीं सदी का हल्ला- उन्नति करे मशीन |
     शाही शिक्षानीति  -  अमीरी  उच्चासन   आसीन |
खड़ी गरीबी गाँव निगलती धरे भयंकर भेष |
कैसे अपना  गाँव बचे  अब  कैसे  अपने  देश ?

Tuesday, January 4, 2011

दहेज़ - नेता उवाच

लेना   और  देना   दहेज़  -  जुर्म    दोनों  है ,
कागज की बातें हैं   कागज में  रहने   दो |
या तो हो शामिल या फिर तुम मौन रहो ,
जो सहने के आदी हैं- सहते हैं, सहने दो |
कौन  रोक  पाया है   कौन   रोक  पायेगा ?
झंझट  न  पालो   गंग  बहती है,  बहने  दो |
रहना    है  शासन   में    कुर्सी    बचानी  है ,
भाषण की   बातें हैं , भाषण   में  कहने दो |

Saturday, January 1, 2011

आओ हे नव वर्ष........

आओ  हे  नव वर्ष   तुम्हारा  स्वागत है |
घर-घर  भर दो हर्ष तुम्हारा स्वागत है  |
      आये कितने  वर्ष  और  फिर चले गए |
      किन्तु सदा से बस गरीब ही छले गए |
      महके बहुत गुलाब यहाँ के उपवन में ,
      पर  मुरझाये  फूल   पाँव  के तले  गए |
आहत है गत वर्ष तुम्हारा स्वागत है |
आओ हे नव वर्ष  तुम्हारा स्वागत है |
        मनुज, मनुज के  लिए न खाई खोदे ,
        मनुज, मनुज के लिए  न काँटे  बोये |
        फिर से कृष्ण  सुदामा के चरणों को ,
        नयनों के जल से प्रेम थाल में धोएं  |
जीवन हो उत्सर्ग तुम्हारा स्वागत है |
आओ हे नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है |