Thursday, June 16, 2011

उर की जो व्यथा है वही कविता है

दीनों  के  घर  में  उजाला  करे  चाहे  छोटा सा दीप वही सविता है |
प्यासों  की  प्यास बुझाये सदा   भरा  कीच तलाव  वही सरिता है |
न्याय  के  संग चले  जो  सदा   न झुके जो कभी नर सो नर सा है |
कवि से कविताई न पूँछो सखे  उर की जो व्यथा है वही कविता है |

Saturday, June 4, 2011

लोकराज में जो हो जाये थोड़ा है

                                                         
                    "  लोकराज में जो हो जाये थोड़ा है "

                  जनता के सर  पड़ता  रोज  हथौड़ा है |   
                  लोकराज में   जो  हो  जाये   थोड़ा है |

कहीं  का पत्थर  और कहीं का रोड़ा है |
भानमती ने  अच्छा   कुनबा  जोड़ा  है |
मनमोहन तो ताक धिना धिन  नाचे हैं ,
दिल्ली - महारानी  का  सीना चौड़ा है |
                  यू पी ने  हर राज्य को पीछे  छोड़ा है |
                 लोकराज  में जो हो  जाये    थोड़ा  है |

पब्लिक को वादों का तोहफा  देता है |
बेईमानी, लफ्फाजी    कर   लेता  है |
घोटालों का बाप जो  दादा  गुंडों का ,
वही आज के दौर का असली नेता है |
                सदन तलक जा पहुंचा मगर भगोड़ा है |
                लोकराज  में   जो   हो  जाये  थोड़ा  है |

मंत्री से संतरी   सभी  तो    चंगे   हैं |
भ्रष्टाचार में करते  हर-हर    गंगे  हैं |
अफसर-बाबू-पुलिस जो रंगबिरंगे हैं ,
देखो सब के सब  हम्माम में नंगे हैं |
              इन्हीं सबों ने मिलकर देश निचोड़ा है |
              लोकराज में  जो  हो  जाये  थोड़ा  है |

महँगाई   द्रौपदी-चीर   सी   बढ़ती  है |
सुरसा   जैसी   मुँह  फैलाये  हँसती है |
निगल रही जिन्दगी गरीबों की,डायन-
महलों में ही  सजती और  सँवरती है |
         सैयाँ बहुत कमाएँ मगर सब थोड़ा है |
         लोकराज  में  जो हो  जाये थोड़ा  है |

घर-घर टी. वी. नंगा नाच दिखाती है |
कम कपड़ों में  महँगे अंग लखाती है |
मर्यादा-तहजीब  बेंच   बाजारों    में ,
देखो अब  राखी  इन्साफ सुनाती है |
           तार-तार सभ्यता ,  प्रदर्शन भोंड़ा है |
           लोकराज  में  जो हो जाये   थोड़ा है |

सौ  में  सत्तर  लोग   आज  भी  निर्धन हैं |
धोता गिलास ढाबे पर देश का  बचपन है |
आज़ादी तो मिली  मगर  बस महलों को ,
सड़कों  पर  आबाद  हमारा   जन-गन है |
          झोपड़पट्टी वतन के तन पर फोड़ा है |
          लोकराज   में  जो  हो जाये   थोड़ा है |

आतंकी मेहमान बने हैं  क्यूँ आखिर ?
सत्ताधर अनजान बने हैं क्यूँ आखिर ?
'फाँसी दो'  फैसला  अदालत करती है ,
सिंहासन बेकान बने हैं  क्यूँ आखिर ?
            देश पे  मरनेवालों   का  दिल  तोड़ा  है |
            लोकराज  में  जो  हो   जाये   थोड़ा है |

मज़हब  और  धर्म    की    ठेकेदारी  है |
मंदिर-मस्जिद जंग  अभी तक जारी है |
'ढाई आखर-प्रेम'  न  कोई   पढ़ा  सका ,
इंसानी   रिश्तों    की    ये   लाचारी है |
            भारत है अखंड- हमने कुछ तोड़ा है |
            लोकराज  में जो हो जाये   थोड़ा है |

चमचागीरी ,  चाटुकारिता   हावी  है |
इज्ज़त  से  जीने  में  बड़ी खराबी  है |
दो रोटी के लिए  जिस्म बिक जाते हैं,
कैसे कह दूँ ? मौसम यहाँ  गुलाबी है |
         सच्चाई से  कलम ने भी  मुँह मोड़ा है |
         लोकराज  में  जो हो   जाये   थोड़ा है |           



Monday, May 30, 2011

राधिका और बाँसुरी

साँस-साँस में बसी थीं,दोनों जग से निराली '
इनके सिवा  न कृष्ण  की  थी कोई साँस री |
अधरों  से खेलती थीं , साथ साथ  रहती थीं ,
सारे जग  की बुझातीं, आत्मा  की प्यास री |
नाचते थे धुनि  सुनि , नारद- विरंचि- शिव ,
प्रकृति भी , गोपियों की श्वाँस प्रति श्वाँस री |
वाह रे कन्हैया ! कभी जान नहीं पाया कोई ,
बाँसुरी थी राधिका  कि  राधिका थीं बाँसुरी | 

Saturday, May 21, 2011

रेडियो रोता है

उसकी बातें क्यूँ  करते हो ?
वो  तो भारत का नेता है  !
एम.पी. है , एम.एल.ए. है 
मिनिस्टर है , कुछ भी है ..
सेन्ट्रल लाटरी का बम्पर विजेता है |


तुमने जिताया है , संसद पहुँचाया है ,
राजधानी दिखलाया है ..
उसने भी इलेक्सन में लाखों उड़ाया है ..
क्या बुरा ?
आज वह तुम्हीं से लेता है...भारत का नेता है !

रोना  है रोते रहो,
जागो या सोते रहो ..
वह तो होशियार है -
जगता है... देश सोता है !

उसके रोने का ढंग भी अजीब है-
कभी चम्बल, कभी बेहमई
कभी भागलपुर , कभी पंजाब
कभी असम
तो कभी कश्मीर में रोता है ..

झंझट ! तुम मरो या जियो
कोई परवाह नहीं
मगर जब वो मरता है...तो रेडियो रोता है |   


Monday, May 16, 2011

" उजला कौआ "...............(रिपोस्ट )


बचपन में दादी मुझे सुलाने के लिए कहतीं भैया सो जा, नहीं तो उजला कौवा आ जायेगा | मै डरकर सो जाता |दादी ने एक दिन एक किस्सा सुनाया था | एक था राजा, राजा बड़ा बहादुर था | अपनी प्रजा के सुखदुख का हमेशा ध्यान रखता था | राजा के राज्य में काले कौवों की संख्या बहुत थी | प्रजा सुखी थी तो उनका जूठन खाकर कौए भी खुश होकर काँव- काँव करते पेड़ों पर , मुंडेरों पर उड़ते, बैठते और मँडराते रहते थे |मगर एक दिन पश्चिम दिशा के जंगल की ओर से झाँव-झाँव , खाँव-खाँव की आवाज आने लगी | लोग कौतूहलवश उसी ओर देखने लगे | तभी बड़े-बड़े डैनो वाले उजले रंग के दैत्याकार कौए आसमान में मडराने लगे | देखते ही देखते उन्होंने काले कौवों पर हमला बोल दिया | जब तक राजा के सिपाही कुछ कर पाते , उजले कौवों का झुण्ड वापस लौट गया लेकिन काफी संख्या में काले कौवों को नोच फाड़कर |काँव -काँव करने वाले कौए चीख चिल्ला रहे थे | कुछ घायल पड़े कराह रहे थे तो कुछ मृतप्राय हो चुके थे | दयालु राजा ने घायल कौवों का इलाज़ करवाया और जो मर गए थे उनका अंतिम संस्कार | फिर तो यह घटना अक्सर घटित होने लगी | थक-हारकर राजा ने पश्चिम के जंगलों में अपना शांतिदूत भेजा | वहां से उजले कौवों के सरदार ने सन्देश भिजवाया कि यदि राजा उसके अधीन हो जाये तो काले कौवों पर हमला नहीं करेंगे बल्कि रोज़ एक-एक का थोड़ा-थोड़ा खून पियेंगे और कभी कभार थोड़ा मांस भी खायेंगे जिससे काले कौए आराम से इसे बर्दाश्त करने के आदी हो जायेंगे | राजा का राजकाज भी चलता रहेगा और उनका पेट भी भरता रहेगा | राजा ने शर्त मान ली | काले कौए धीरे-धीरे कम होने |                                                 

                           तब से कई वर्षों बाद ----------
                                    
                आज देखा कि एक काला कौवा रोटी के जुगाड़ में इधर-उधर भाग रहा है | कभी पेड़ की डाल पर बैठता है तो कभी उड़कर जमीन पर आ जाता है और बर्तन साफ़ कर रही घरैतिन से बस थोड़ी दूरी पर सतर्क बैठ जाता है |दांव मिलते ही पड़ा हुआ बचाखुचा जूठन चोंच में दबाकर भाग जाता है और छत की मुंडेर पर बैठकर खा रहा है | बीच बीच में कांव -कांव की कर्कश आवाज से अपनी बिरादरी के लोंगो को भी बतलाता जा रहा है कि भूख  लगी हो तो आ जाओ , पेट भरने को अभी यहाँ रोटी के टुकड़े और सीझे चावल काफी हैं | दो -चार कौए कांव-कांव करते और आ गए |तभी जोर-जोर से गाड़ियों की घरघराहट और हार्न बजने की आवाज सुनाई देने लगी | गाँव के बच्चे , कुछ नंगे तो कुछ अधनंगे सभी कुलांचे भरते गाड़ियों की ओर दौड़े | गाड़ियों की झांव-झांव आवाज ने पूरे गाँव को चौंका दिया | सभी घरों के मर्द बाहर निकल आये तो औरतें किवाड़ों को आधा खोल बाहर झाँकने लगीं | अचानक सभी गाड़ियाँ गाँव के बीचोबीच नेताजी के दरवाजे पर रुक गयीं | गाड़ी में से सफ़ेद लकझक कुर्ता पाजामा पहने दो तीन व्यक्ति कई असलहा धारियों के साथ बाहर निकले और सबकी ओर दोनों हाथ जोड़ हवा में हिलाते हुए बोले  "भैया ,राम राम "|
                                     नंगे-अधनंगे बच्चे जो ठिठक कर रुक गए थे और देख रहे थे , वे धीरे-धीरे पीछे वापस लौटने लगे | दौड़ते हुए उल्टे पाँव आते लडको से ,लकड़ी के सहारे धीरे धीरे आ रहे जगन लोहार ने पूछा , "कौन है रे , कौन आया है " लड़के सुर में सुर मिलाकर चिल्लाये ....

                   काला कौवा  काँव काँव  , उजला कौवा खाँव खाँव  |
                   काला कौवा जूठन खाय, उजला कौवा मांस चबाय |  
                   काला कौवा  पानीपून ,  उजला  कौवा  पीवै  खून  |
                    हांड मांस का न्यौता है , राजा से  समझौता  है |

                   भागो भैया भागो !   उजला कौआ आया   है.....    
  

Monday, May 9, 2011

काहू में मगन कोऊ काहू में मगन है

          माया  के अपार मोहजाल  में भुलान  कोऊ ,
          कोऊ   राम नाम   में   लगाय  रह्यो  मन है |
          कामिनी  कमान नैन  बींधि गयो  काहू उर ,
          कोऊ   भाव भगति   भुलाय  दियो   तन है |
          कोऊ दोऊ हाथन सों बाँटि रह्यो भुक्ति-मुक्ति ,
          कोऊ  दोऊ  हाथ   सों  बटोरि   रह्यो  धन है |
          साधो !  ऐसा    जग   है     बेढंगा    बहुरंगा ,
          कोऊ काहू  में मगन  कोऊ काहू में मगन है | 

Monday, May 2, 2011

हम अपना सूरज लाये हैं

                          ( १ मई --मजदूर दिवस पर  ......देश के मेहनतकशों के नाम )

क्या कुछ तेरे पास नहीं है ?
अरे जरा अपनी ताक़त को 
जान और पहचान तो भाई !

       तेरे दो  मज़बूत हाथ हैं 
       हाथों में हल है कुदाल है 
       हँसिया, खुरपा और फावड़ा 
       जिनसे तू बंज़र धरती  भी 
       चीर चीर जीवन उपजाता
तेरे दो मज़बूत हाथ हैं 
हाथों में दमदार हथौड़ा 
याकि बंसुला और रुखानी 
मिलों और कारखानों की 
बड़ी दैत्याकार मशीनें 
जिन्हें चलाकर 
लहू से अपने 
देश की तू किस्मत लिखता है
       तुझमे तो मेहनत का बल है 
       साहस का पहाड़ जैसा तू 
       तुझ जैसा कर्तव्यपरायण 
       भला विश्व  में और कौन है ?

फिर भी तू कितना सहता है !

       बना है क्यों भाड़े का टट्टू
       लोगों के हाथों का लट्टू 
       बिलकुल एक भिखारी जैसा 
       भाग्य और भगवान भरोसे..
       
       क्यों ऐसा जीवन जीता है ? 
       मात्र दया पर जिंदा रहना 
       सीख लिया क्यों आखिर तूने ?

आज न कोई मालिक नौकर 
सब के सब इंसान बराबर 
स्वाभिमान से जिंदा रहना 
और शान से जीवन जीना 
अपने अधिकारों की खातिर 
लड़ना पड़े तो खुलकर लड़ना 
यही सत्य है ...और नहीं कुछ 

       हाथों में जलती मशाल ले 
       अपने जीवन का अँधियारा 
       तुझको ही है आज मिटाना.. 

तेरा सूरज क़ैद किये जो 
मुट्ठी में हैं बंद किये जो 
जोर लगाके खोल दे मुट्ठी  
तोड़ दे हाथ मरोड़ दे मुट्ठी 

       जो तुझको भरमाते आये 
       सपनों में भटकाते आये 
       तेरा चैन चुराते आये 
       उल्टे  पाठ पढ़ाते आये 
       कभी तेरा सम्मान न समझा 
       कभी तुम्हें इंसान न समझा        
       नोच दे इनका आज मुखौटा 
       असली चेहरा दिखा दे सबको 
       भलीभाँति ये बता दे इनको... 

अब हम और नहीं रोयेंगे 
अब हम और नहीं सोयेंगे

जाग उठे हम-जगी ज़वानी 
जागी खेती जगी किसानी 
खेत ज़गे खलिहान जगे हैं 
धरती की संतान जगे हैं 
हम भी हैं इंसान-जगे हैं 

शहरों के फुटपाथ जगे हैं  
झोपड़पट्टे  साथ जगे हैं 
आज करोड़ों हाथ जगे हैं 
मिलों के गर्द गुबार ज़गे हैं 
हम  धरती के भार ज़गे हैं 
गद्दारों के काल ज़गे है 
सोकर सालोंसाल, ज़गे हैं 
       
       अपना हक लेने आये हैं 
       हम अपना सूरज लाये हैं 

अब हमको भरमाना छोड़ो
अब हमको भटकाना छोड़ो 
जाति-धरम के दाँव चलाकर 
आपस में लड़वाना   छोड़ो..

       भागो-हटो हवाला वालों 
       रोज़बरोज़ घोटाला वालों 
       शांति और सुख हरने वालों 
       हरियाली  को  चरने वालों 
       सिर्फ तिजोरी भरने वालों 
       देश का सौदा करने वालों 

देश को अब नीलाम करो मत 
और इसे बदनाम करो मत 
लोकतंत्र की चीर हरो मत 
देश का बंटाधार करो मत 

       हमें छलावा नहीं चाहिए 
       हमें भुलावा नहीं चाहिए 
       हमको अपना अमन चाहिए 
       हमको अपना वतन चाहिए 
       हमको अपनी धरती प्यारी 
       हमको अपना गगन चाहिए 

अपना हक लेने आये हैं ...
हम अपना सूरज लाये हैं..