Thursday, March 10, 2011

फागुन के रस माते दोहे

       फगुनाया सूरज  उठा , अरुणिम बालस्वरुप |
       आँगन-आँगन बाँटता,  अँजुरी-अँजुरी   धूप |

       रजनी  रूप   सँवारती,  कजरे-कजरे    केश |
       बदरी-बदरी    चंद्रमा ,  आये   अपने     देश |

       गोरी  ठाढ़ी  द्वार  पर, पिय-पथ  रही  निहार |
       मदिरा-मदिरा नैन हैं ,  अंग-अंग   कचनार |

       कविता कामिनि के सभी ,टूट गए अनुबंध |
       दोहे    जैसी      देह     थी ,हुई  सवैया  छंद |

       फागुन गुन-गुन गा रहा, पिए गुनगुनी धूप |
       सरसों सरसों मन लगे , टेसू      टेसू    रूप |

       सूखि गयी लकड़ी भई,पिया मिलन की चाह |
       अब घर आ जा जोगिया,जोगिनि  देखे  राह |

       धवल चाँदनी सा  खिला,  गोरी   तेरा   रूप |
       इन्द्रधनुष  के  रंग,जब  पड़े  फागुनी   धूप |

       राग   और  वैराग में ,  रही  न   कोई  जंग |
       एक   रंग  दोनों  रँगे , पिए   दूधिया   भंग |

     नैन सैन,चितवन,चुभन, मान और मनुहार |
     अंगुरी दाबे  रस  चुवै,  गुझिया  जैसा  प्यार |

    फागुन में भी पिया जब, लिए न घर का हाल |
    भाभी   के   नैना   झरैं,   देवर   बना   रुमाल |

     फागुन  की सीढ़ी चढ़ा, फिसल  गया   वैराग |
     गिरा अनंगी रंग  में,  नस-नस  फूटी   आग |

     फागुन  वृन्दावन गयो , भूलि गयो निज  नाम |
     राधे-राधे  रमि   गयो,  वन-वन खोजत श्याम |

Saturday, March 5, 2011

कविता......, खर्चती साँसें......

                  कविता ..

     जो भी व्यक्त हो रही है 
     कविता नहीं है 
     कविता है वह 
     जो व्यक्त होना चाहते हुए भी
     अव्यक्त है
     बंद है अंतस में
     उस भँवरे की तरह
     जो साँझ होते ही
     बंद हो जाता है
     कमल की पंखुड़ियों में
     कविता और भँवरा
     दोनों को इंतज़ार है
     सुबह  के सूरज का  
     ताकि बंधनमुक्त हो
      उड़ सकें
     वे अपने
     उन्मुक्त आकाश में
     किन्तु दोनों के
     सूरज हैं अलग-अलग
     भँवरा
     मुक्त हो जाता है
     आते ही  
     अपने सूरज के
     पर कविता
     जीती है
     एक सतत घुटन
     अपने सूरज की
     अनवरत प्रतीक्षा में....

                  खर्चती साँसें.....

      बेवजह ही
     खर्च होती जा रही हैं
     जिंदगी की साँसे...
     उन
     फुटकर रुपयों की तरह
     जो नोट से टूटकर
     इस  महँगाई में
     जाने अनजाने
     राशन
    आलू-प्याज..
    की खरीदारी पर
    जेबों से खुद बखुद
    निकलकर
    खर्च हुए  जा रहे हैं....  


Thursday, March 3, 2011

महाशिवरात्रि पर ..भावी हू मेटि सकैं त्रिपुरारी

भाल पे चन्द्र जटाओं में गंग  सुकंठ  पे  ब्याल  रहा   फुफकारी |
हाथ त्रिशूल विराजत नाथ के   देवों  के देव  की है  छवि न्यारी |
वाम   सुसाजति   मातु महा   जननी जग की  जग पालनहारी |
और जो देव  करें  सो करें  पर   भावी  हू  मेटि  सकैं   त्रिपुरारी |


गौर शरीर पे भस्म  चिता की  ये बाबा जी  देखो  लगाये हुए हैं | 
तीनिहु लोक के मालिक आप   पहाड़ पे   धूनी   रमाये   हुए हैं |
वेश   असुंदर   धारे  हुए   पर   सुन्दर   सृष्टि    सजाये    हुए हैं |
आप  मे  विश्व समाया  हुआ पर   भक्तों  मे आप समाये  हुए हैं | 

Monday, February 28, 2011

नाक

( आज एक बाल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ जो  सन २००० में प्रकाशित मेरे बाल कविता संग्रह    'बिल्ली का  संन्यास' शीर्षक पुस्तक में संग्रहीत है )

 
मुखड़े   को  सुन्दरता   देती -
है,  चेहरे  पर   सुन्दर  नाक |
सारे   अंग   जरूरी    हैं , पर-
नहीं किसी से कमतर नाक | 

            दो काली  आँखों  के  नीचे ,
           बीचे  बांध   सरीखी  नाक |
           मुख  से  पहले ऊपर  बैठी ,
           छोटी हो या बड़ी सी  नाक |

देखो कितनी अच्छी लगती-
है , तोते  की ठोर   सी नाक |
अलग से जैसे छोपी लगती ,
होती  जो  कंडौर  सी  नाक |

         कोई  भिन्डी  जैसी  लम्बी ,
         कोई दबी सी चिपटी नाक |
         कोई  फैले   नथुनों  वाली ,
         ज्यों लुहार की भट्ठी नाक |

तरह-तरह आकारों  वाली ,
मोटी हो  या  पतली  नाक  |   
मुखड़े का  भूगोल बनाती ,
होती  बहुत  जरूरी  नाक |

          अच्छे काम सदा करते जो ,
          ऊँची  रहती   उनकी  नाक |
         बुरे  काम  करनेवालों   की ,
         बिना कटाए कटती   नाक  |

Thursday, February 24, 2011

....मेरी कविता

महल का कब ? सड़क का साथ करती है मेरी कविता |
वख्त  से  भी  तो  दो- दो  हाथ  करती है  मेरी कविता |

नफरतों   से  झगड़ती  है  तो  अम्नोंचैन  की  खातिर ,
जहाँ  में  प्रेम  का   उन्माद   भरती  है   मेरी  कविता |

नहाकर  चांदनी   में   ये   कभी   लगती   परी   जैसी ,
कभी  आगों  की  दरिया से  गुजरती है  मेरी  कविता |

रंग  पर  रंग  का  मौसम   फुहारें    घन-घटाओं   की ,
फाल्गुन   में  भी सावन  बन  बरसती है  मेरी  कविता |

अंधेरो  की   सियासत  से     अकेली  जूझती  भी  है ,
जुगनुओं की तरह पल पल चमकती है मेरी कविता ||

शहर की  तंग  गलियों में  घुटन की पीर  पी-पी  कर ,
खेत-खलिहान  के  रस्ते   विचरती है   मेरी  कविता |

थपेड़े     झेलती   है      काँपती      आँसू    बहाती  है '
रोज  पतझड़ के साये में   सँवरती  है   मेरी  कविता | 

Monday, February 21, 2011

लोकतंत्र को निगल गया भ्रष्टाचार का अजगर ..

हाँ ! मैं देख रहा हूँ | क्या आपने नहीं देखा ? आप भी देख रहे हैं | हम सब देख रहे हैं , मगर तमाशबीन की तरह | कुछ करना  भी चाहें तो क्या करें ? सिर्फ हो-हल्ला ही तो मचा सकते हैं | मचा भी रहे हैं मगर कोई असर नहीं |
हाँ , तो हम सबने देखा - काफी समय पहले से जिस भ्रष्टाचार के भीमकाय भयंकर अजगर ने  देश के लोकतंत्र को निगलना शुरू किया था , अब पूरा का पूरा निगल गया - सिर से पाँव तक ! लोकतंत्र अब अजगर के पेट में है | वह अजगर की आँखों से ही थोडा-बहुत बाहर देख लेता है , उसी की साँस पर जिन्दा है ,बाहर आने को छटपटाता है | अजगर के पेट में फँसा बेचारा हाथ-पाँव मारता है मगर दूसरे ही पल आँखें मूँद लेता है | एक आम आदमी की तरह मौत से जूझ रहा है - बेचारा बेबस लोकतंत्र ! लगता है कि अब जान गई कि तब , पर दूसरे ही क्षण वह फिर हरकत में आ जाता है | मृतप्राय है पर जिजीविषा बाकी है |
     क्या कोई चमत्कार होगा ? कोई मसीहा आएगा इसे बचाने ? कौन फाड़ेगा अजगर का पेट ? पेट फाड़कर लकवाग्रस्त हो चुके लोकतंत्र को बड़ी सावधानी से बाहर निकालेगा,उसके क्षतिग्रस्त अंगों की मरहम-पट्टी  करेगा , खुली हवा में बाहर घुमायेगा | धीरे-धीरे घायल लोकतंत्र स्वस्थ हो जायेगा | तब वह बेचारा नहीं रहेगा  |
अगर फिर कभी अजगर  उसे दुबारा निगलने का प्रयास करेगा तो वह अपनी चारों बलिष्ठ भुजाओं से उसके जबड़ों को पकड़कर फाड़ देगा | भ्रष्टाचार का अजगर हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगा | लोकतंत्र की घर-गृहस्थी फिर से बसेगी, उसके आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजेगी और वह बड़ी शान से सीना चौड़ा करके पूरे संसार को अपनी बलिष्ठता और स्वतंत्रता की चुनौती  देगा |





Saturday, February 19, 2011

संत भरत मुनि एवं संत रविदास जी क़ी शुभ जयंती ( १८ फरवरी ) पर.....

     आज हमारे देश की दो महान विभूतियों का जन्म दिवस है---

पहला ---नाट्यशास्त्र के प्रणेता महाज्ञानी भरत मुनि महाराज का |
दूसरा ----महान संत रविदास ( रैदास )जी का |
               इन दोनों महान आत्माओं का कोटि-कोटि वंदन करता हूँ | इन महापुरुषों का स्मरण उनके महान जीवन और अनुकरणीय सुकृत्यों के लिए युगों-युगों तक किया जाता रहेगा |

                                  भरत मुनि 
       भरत मुनि जी प्राचीनतम संगीतवेत्ता थे | पुराणों के अनुसार जब देवताओं ने ब्रह्मा जी से एक ऐसे वेद की रचना करने का अनुरोध किया जो सामान्य आदमी द्वारा समझा जा सके तो उन्होंने पंचम वेद की रचना की , जो नाट्य वेद कहलाया | इसमें शब्द ऋग्वेद से , अभिनय यजुर्वेद से , गीत-संगीत सामवेद से और रस आदि अथर्ववेद से शामिल किये गए | नाट्य वेद की रचना के बाद ब्रह्माजी ने संत भरत मुनि से धरती पर इसके प्रचार-प्रसार के लिए कहा | 
               संत भरत मुनि ने 'नाट्यशास्त्र ' का सृजन २००-३०० ई० पू० के बीच किया जो नाट्यकला का आदिग्रंथ 
माना जाता है |


                              संत रविदास  
           संत रविदास जी ने धर्म  से मानवता को जोड़ने का अभूतपूर्व कार्य किया | सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने का उनका प्रयास चिरस्मरणीय रहेगा | पंद्रहवीं शताब्दी में भक्ति आन्दोलन के प्रमुख संतों में उनका सर्वोच्च स्थान है | माना जाता है कि कबीर,मीरा,संत नामदेव जैसे महान भक्त कवि, संत रविदास  के समकालीन थे | कबीरदास जी ने उनकी प्रशंसा में लिखा था ,'साधुन में रविदास संत हैं ,सुपच ऋषि सौ मानिया|
हिंदू तुर्क दुई दीन बने हैं ,कछू नहीं पहचानिया |' मीरा जी ने भी लिखा ,' गुरु मिलिया रैदास जी ...' |
       संत रविदास जिन्हें संत रैदास भी कहा जाता है ,का जन्म बनारस के एक दलित (चर्मकार ) परिवार में हुआ था | वे  ईश्वर की भक्ति के साथ-साथ अपना पुश्तैनी व्यवसाय ( जूते बनाना ) भी  पूरे मन से जीवनपर्यंत करते रहे  | उन्होंने कहा कि कोई भी काम छोटा  या बड़ा नहीं होता , मेहनत और ईमानदारी से की हुई कमाई ही फलित होती है न क़ि शोषण और ठगी से | उनकी मान्यता थी क़ि घर-परिवार में रहकर अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन करके भी परमात्मा को पाया जा सकता है , उसे पाने के लिए कपडा रंगने या धूनी रमाने की कोई जरूरत नहीं | संत रविदास ने स्वच्छ मन और ईमानदारी से जीवन जीने वाले को ही सच्चा इन्सान बताया | उनका कहना था....".मन चंगा तो कठवत में गंगा "|
           संत जी ने  समाज को दिखाया कि व्यक्ति जन्म से नहीं बल्कि कर्म से महान बनता है | जाति-पांति के आधार पर ऊँच-नीच का भेदभाव करने वालों को उन्होंने कड़ी फटकार लगाई | उन्होंने कहा कि ऐसे विचार रखने वालों से  भगवान कभी खुश नहीं हो  सकता क्योंकि उसने तो सबको समान बनाया है , अहंकार मुक्त होने पर ही
सच्ची भक्ति संभव है |विभिन्न धर्मों में हो रहे पाखंड और अन्धविश्वास का उन्होंने जमकर विरोध किया | उन्होंने नफरत,और हिंसा का प्रतिकार प्रेम और अहिंसा से किया | इसीलिए वे लोगों के प्रेरणास्रोत बने |यह उनकी लोकप्रियता एवं भक्ति की पराकाष्ठा ही  थी कि उनके रचित चालीस भक्ति पद सिख धर्म के आदिग्रन्थ में शामिल किये गए | संत रविदास का जीवन एवं उनके विचार भारतीय समाज के लिए सदैव अनुकरणीय एवं प्रासंगिक रहेंगे |