Tuesday, August 31, 2010

गर कलम बनी तलवार नहीं

भाईचारा   और   एकता   का   अमृत    बरसाती   है |
देशवासियों  और  देश  को  सुखी  देख   हर्षाती  है |
अंगारों  में  पड़कर  भी  जो  आग  उगलती रहती है |
सुविधाओं के नाम बिकी वह कलम नहीं हो सकती है |
देख देश को संकट में गर कलम बनी तलवार नहीं |
तो फिर कलमकार कहलाने का हमको अधिकार नहीं |    

4 comments:

  1. अंगारों में पड़कर भी जो आग उगलती रहती है |
    सुविधाओं के नाम बिकी वह कलम नहीं हो सकती है |

    बहुत बढ़िया मित्र ... अच्छी रचना ....

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  2. बहुत बेहतरीन!

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