Tuesday, October 12, 2010

जिंदगी हमारी इक गरीब की कमीज़ है

सीख लिया इससे ही रोते-रोते हँसना भी,
गम से बड़ा   न कोई   अपना अज़ीज़ है |
जिंदगी के जहर को   पल-पल पीना,और-
हँस-हँस कर    इसे जीना   बड़ी  चीज है |
कोई कहता है, " यार बड़ा है तमीजदार"
कोई कहता है ,  "  यार  बड़ा  बेतमीज है |"
लगे हैं    पैबन्दों पे पैबंद  मेरे मीत , यह-
जिंदगी हमारी इक गरीब की कमीज़ है |



2 comments:

  1. सुरेन्द्र बहादुर सिंह " झंझट गोंडवी " जी
    क्या बात है कविराज ! बहुत शानदार कवित्त लिखा है आपने ।
    जिंदगी हमारी इक गरीब की कमीज़ है
    पढ़ कर आनन्द आ गया । बधाई !
    आपके ब्लॉग पर लगी कुछ और रचनाएं भी पढ़ीं , सब पसंद आईं ।

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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