प्रीति की रीति इतनी निभा दीजिये |
मेरे आंसू हैं - मोती बना दीजिये |
सिर्फ इक बार अधरों से छूकर मुझे ,
मैं हूँ पत्थर- नगीना बना दीजिये |
मुझको चाहो न इतना मैं डर जाऊँगा |
दिल का शीशा जो टूटा बिखर जाऊँगा |
गर किया दूर नज़रों से मुझको कहीं ,
जाऊंगा पर न जाने कहाँ जाऊँगा |
Thursday, September 9, 2010
Wednesday, September 8, 2010
मुक्तक
ऐसे अंधियारे में सविता की बात करते हो |
प्यार की , स्नेह की , ममता की बात करते हो |
जहाँ कुर्सी बड़ी है देश से , मनुजता से ,
यार किस दौर में कविता की बात करते हो ?
हर तरफ छाया हुआ है धुआं काला-काला |
देश अब कौन तेरी फ़िक्र है करने वाला |
तेरे टुकड़े हजार करनेवाले हैं तो बहुत ,
कोई दिखता नहीं तेरी शान पे मरनेवाला |
दिल में सहेजे दर्द का सारा ज़हान हूँ |
चीखों से- कराहों से भरा आसमान हूँ |
अपनों ने किया जर्जर फिर भी महान हूँ |
कवि नहीं हूँ दोस्त मैं हिन्दोस्तान हूँ |
प्यार की , स्नेह की , ममता की बात करते हो |
जहाँ कुर्सी बड़ी है देश से , मनुजता से ,
यार किस दौर में कविता की बात करते हो ?
हर तरफ छाया हुआ है धुआं काला-काला |
देश अब कौन तेरी फ़िक्र है करने वाला |
तेरे टुकड़े हजार करनेवाले हैं तो बहुत ,
कोई दिखता नहीं तेरी शान पे मरनेवाला |
दिल में सहेजे दर्द का सारा ज़हान हूँ |
चीखों से- कराहों से भरा आसमान हूँ |
अपनों ने किया जर्जर फिर भी महान हूँ |
कवि नहीं हूँ दोस्त मैं हिन्दोस्तान हूँ |
Tuesday, September 7, 2010
सबके लिए बराबर होती है फटकार कबीरा की
राम रहीम आस्थाओं के पूजनीय हैं , प्यारे हैं |
इनको लेकर नफरत फैलाने वाले बेचारे हैं |प्रेम जहाँ रसखान का वहीँ प्रीति मिलेगी मीरा की |
सबके लिए बराबर होती है फटकार कबीरा की |
जिनकी वाणी से बहती समता की अमृतधार नहीं |
उन्हें समाजसुधारक बनने का कोई अधिकार नहीं|
Monday, September 6, 2010
ग़ज़ल
तुम कहते हो मौसम बहुत सुहाना है |
इसी बात का मातम मुझे मनाना है |
सावन के अंधों किस भ्रम में खोये हो
हरियाली थी कभी आज वीराना है |
महंगाई तो महलों से अनुबंधित है
झोपड़ियों को इसका मोल चुकाना है |
उधर उजाला -इधर अँधेरा रहता है
शायद मेरे देश का सूरज काना है |
Friday, September 3, 2010
आ गयो माखनचोर ................
हे प्रभो कृष्ण कन्हैया , रासरचैया ,नाग नथैया,कंसारी - मुरारी ,जग तारक-उद्धारक,वासुदेव -नन्दलाल -यशोदानंदन , ब्रजबिहारी-गोवर्धनधारी आप पधारे -भाग्य हमारे | आप ने हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी भादौं की अष्टमी को कारी अंधियारी रात में पुनः जन्म ले लिया भारतभूमि पर | आपका शत-शत वंदन है -अभिनन्दन है | हे सुदामा के मित्र दीनबंधु : आज असंख्य सुदामा आपकी कृपादृष्टि के लिए व्याकुल हैं |मंहगाई ,शोषण और गरीबी ने इन्हें असहाय बना रखा है | मुष्टिक और चान्डूर इन्हें उठा -उठा कर पटक रहे हैं | इनकी जान के लाले पड़े हुए हैं | हे प्रभो : इन्हें अपने गले से लगा लो -इनकी जिन्दगी में भी खुशहाली ला दो | प्रभो : आप तो जगतपिता हैं , विश्व के पालनहार हैं , आपके संकेत मात्र से क्या कुछ नहीं हो सकता ? एक बार अपनी भारत भूमि पर दृष्टि डालो भगवन : आज एक नहीं अनेकों कंस हैं जो अपने अत्याचारों से जनता को त्रस्त कर रहे हैं | छोटे कंस -बड़े कंस और उनके असंख्य मुष्टिक और चान्डूर पूरे देश में दिल्ली से गाँव तक फैले हुए हैं | कौरवों की असंख्य सेना पांडवों पर भारी पड़ रही है | भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य नमक की कीमत अदा कर रहे हैं , द्रौपदी के चीरहरण में मौन बैठे हैं | धर्मराज द्यूतक्रीड़ा में अपना सब कुछ हार बैठे हैं | अपने आपको आपका वंशज बताने वाले भी कंसलीला में शामिल हैं | कुबलयापीड़ पगलाया हुआ है, उसका दांत उखाड़ने वाला भला आपके सिवा कौन हो सकता है | आपने पेय जल को विषाक्त कर देने वाले कालिया नाग को नाथा था | आज ऐसे जाने कितने नाग खुली सड़कों पर नर्तन कर रहे हैं | आपने दूध, दही,घी को ब्रज से मथुरा जाने से रोकने के लिए दूध -दही की मटकियाँ फोड़ी थीं | अपने साथी ग्वाल बालों को स्वस्थ रखने के लिए घर-घर माखनचोरी की | नारियां कभी मर्यादा की सीमा को लाँघ कर नग्नता तक न पहुँच जाएँ ,इसीलिए आपने चीरहरण का खेल किया |नए गौरवपूर्ण भारत निर्माण के निमित्त महाभारत का युद्ध रचाया | अभिमानी देवराज इन्द्र का मानमर्दन करते हुए आपने गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाकर दिखला दिया कि जलवर्षा पहाड़ों और जंगलों को बचाने एवं उन्हें सम्मान देने पर ही होगी | बता दिया कि जनता के लिए दम्भी देवता से कहीं अधिक पर्वत और वन पूजनीय हैं जिनसे अनेकानेक जड़ी बूटियाँ ,लकड़ियाँ ,वर्षा और हरियाली मिलती है | आपका एक-एक कदम मानवता का आदर्श बन गया
पर हे बनवारी : आज सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है | अपनी वंशी की मधुर धुन पर जड़ -चेतन को विमोहित कर नचाने वाले हे राधे रमण : विश्व को गीत-संगीत का ज्ञान करानेवाले भी तो आप ही हैं | फिर कैसा विलम्ब प्रभो ! अपने भारत को एक बार फिर उसी शिखर तक पंहुचा दो जहाँ पहले कभी था |
पुनः-पुनः कोटि-कोटि वंदन है -अभिनन्दन है आपका! हे नयनाभिराम ! शत-शत प्रणाम !
Thursday, September 2, 2010
शहीदों की मजारों पर..............
कुछ समय पहले मैंने किसी अख़बार के भीतरी पन्ने के एक कोने में छपी एक खबर पढ़ी की एक अमर शहीद की नब्बे वर्षीया विधवा के पास रहने के लिए घर नहीं है | वह एक खंडहरनुमा कमरे में किसी तरह गुजर बसर कर रही है , जिसकी छत से बरसात का लगभग आधा पानी अन्दर आ जाता है | बहुत लोगों ने यह खबर पढ़ी होगी | कुछेक प्रतिक्रियाएं भी आयीं | इसी क्रम में अभी कुछ दिनों पहले अख़बार में एक और खबर छपी | क़स्बा उतरौला , जनपद -बलरामपुर , उ० प्र० निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व० महादेव प्रसाद जी का प्रपौत्र कस्बे की सड़कों और गलियों में भीख मांग रहा है | वे दो भाई हैं |उनके रहने को न तो घर है और न खेती के लिए जमीन | छोटे भाई का एक पैर बीमारी के कारण ख़राब हो गया है और बड़ा भाई उसीके इलाज के लिए भीख मांग रहा है | वे सड़क के किनारे या किसी दयालु के दरवाजे पर रात में सो जाते हैं और अगल-बगल के लोगों से खाने को जो कुछ मिल जाता है उसी से अपने पेट की आग बुझा लेते हैं | इस समाचार पर भी कुछ व्यक्तियों एवं संस्थाओं की प्रतिक्रियाएं पढने को मिलीं | समाज के कुछ बुद्धिजीवियों ने राज्य एवं केंद्र सरकार को संवेदनहीन कहते हुए भर्त्सना की | कुछ स्थानीय नेताओं ने यथासंभव मदद करने का वादा किया तो अधिकारियों ने जांच करके उचित कार्यवाही किये जाने की बातें कहीं | तीसरे दिन सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो गया | मन ग्लानि से भर गया | शायद कुछ रुपये अमर शहीद की बुजुर्ग विधवा को दे दिए गए हों लेकिन नया घर तो नहीं ही दिया गया होगा | स्वतंत्रतासंग्राम सेनानी के प्रपौत्र को भी शायद कुछ आर्थिक सहायता दे दी गयी हो किन्तु रहने के लिए घर ,जीविकोपार्जन का कोई स्थाई साधन और बीमार भाई के सम्यक इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं ही उपलब्ध कराई गई होगी |
ऐसा क्यों ? देश को आजादी दिलाने के लिए जिन बीर बांकुरो ने या तो लड़ते-लड़ते अपने प्राण निछावर कर दिए या आजीवन कारावास और काला पानी की सजा पाकर भयंकर यातनाएं झेली , उनके परिवार के लोगों को इस देश और समाज ने क्या दिया | हम सभी भारतवासियों को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के एवज में आज इनके परिवारों को ऐसे दिन क्यों देखने पड़ रहे हैं ? हम कितने स्वार्थी और संवेदनहीन हो गए हैं ? केंद्र और राज्य सरकारें जानबूझकर इनकी उपेक्षा क्यों कर रही हैं ? सरकारी नौकरी वाले वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल करते हैं , सरकारें झुकती हैं , मांगें मानती हैं | कुछ न कुछ वेतन जरूर बढ़ता है | व्यापारी हड़ताल करते हैं उन्हें भी रियायतें मिलती हैं | और तो और देश की संसद में जनता द्वारा चुने गए सांसद भी अपना वेतन कई गुना बढ़ाकर नौकरशाहों से अधिक पाने की लालच में समानांतर लोकसभा कार्यवाही तक चलाते हैं | राजनैतिक पार्टियाँ देश स्तर से ग्राम स्तर तक अपने सदस्य बनाती हैं | चुनाव में अपनी हार जीत का सर्वे कराती हैं |
फिर क्या कारण है कि आजादी की लड़ाई में शहीद बलिदानियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों की संख्या का सर्वे केंद्र और राज्य सरकारें नहीं कराती| उनकी वर्तमान पारिवारिक स्थिति का आकलन करके आधारभूतआवश्यकताओं को क्यों नहीं पूरा करती ? हम आम लोग इसे क्यों अनदेखा कर रहे हैं ? हम इनकी दुर्दशा को समाप्त करने और इन्हें पूरी तरह सरकारी संरक्षण दिए जाने के लिए कोई आन्दोलन क्यों नहीं चलाते ? जबकि कोई सांसद या विधायक , चाहे वह एक दिन के लिए ही क्यों न चुना जाए , पूरी पेंशन और अन्य सुविधायें पाने का हक़दार हो जाता है तो जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहुतियाँ दे दी उनके परिवार के साथ ऐसा क्यों ? हम हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस क्यों मनाते हैं ? यह देश और देश के लिए अपना सब कुछ लुटा देने वालों के साथ मजाक नहीं तो और क्या है ?
क्या इतना ही गा लेने से इनके प्रति हमारे कर्तव्यों की इतिश्री हो जाती है -
" शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले ,
वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा |"
ऐसा क्यों ? देश को आजादी दिलाने के लिए जिन बीर बांकुरो ने या तो लड़ते-लड़ते अपने प्राण निछावर कर दिए या आजीवन कारावास और काला पानी की सजा पाकर भयंकर यातनाएं झेली , उनके परिवार के लोगों को इस देश और समाज ने क्या दिया | हम सभी भारतवासियों को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के एवज में आज इनके परिवारों को ऐसे दिन क्यों देखने पड़ रहे हैं ? हम कितने स्वार्थी और संवेदनहीन हो गए हैं ? केंद्र और राज्य सरकारें जानबूझकर इनकी उपेक्षा क्यों कर रही हैं ? सरकारी नौकरी वाले वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल करते हैं , सरकारें झुकती हैं , मांगें मानती हैं | कुछ न कुछ वेतन जरूर बढ़ता है | व्यापारी हड़ताल करते हैं उन्हें भी रियायतें मिलती हैं | और तो और देश की संसद में जनता द्वारा चुने गए सांसद भी अपना वेतन कई गुना बढ़ाकर नौकरशाहों से अधिक पाने की लालच में समानांतर लोकसभा कार्यवाही तक चलाते हैं | राजनैतिक पार्टियाँ देश स्तर से ग्राम स्तर तक अपने सदस्य बनाती हैं | चुनाव में अपनी हार जीत का सर्वे कराती हैं |
फिर क्या कारण है कि आजादी की लड़ाई में शहीद बलिदानियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों की संख्या का सर्वे केंद्र और राज्य सरकारें नहीं कराती| उनकी वर्तमान पारिवारिक स्थिति का आकलन करके आधारभूतआवश्यकताओं को क्यों नहीं पूरा करती ? हम आम लोग इसे क्यों अनदेखा कर रहे हैं ? हम इनकी दुर्दशा को समाप्त करने और इन्हें पूरी तरह सरकारी संरक्षण दिए जाने के लिए कोई आन्दोलन क्यों नहीं चलाते ? जबकि कोई सांसद या विधायक , चाहे वह एक दिन के लिए ही क्यों न चुना जाए , पूरी पेंशन और अन्य सुविधायें पाने का हक़दार हो जाता है तो जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहुतियाँ दे दी उनके परिवार के साथ ऐसा क्यों ? हम हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस क्यों मनाते हैं ? यह देश और देश के लिए अपना सब कुछ लुटा देने वालों के साथ मजाक नहीं तो और क्या है ?
क्या इतना ही गा लेने से इनके प्रति हमारे कर्तव्यों की इतिश्री हो जाती है -
" शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले ,
वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा |"
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