Tuesday, March 15, 2011

नव गीत

आने को आया है मौसम मनभावन 

           आग राग गाती हैं मौसमी  बहारें |
           सूखे जले पत्तों को बुहारतीं बयारें |

गालों पर फागुन है आँखों में सावन ...

          कोयल मृदुबैनी है तन-मन की काली |
          कौए से  करवाती  शिशु की रखवाली |

छलनाओं के कर में सपनों का दरपन...

           इच्छायें ऊँची ज्यों कचरे पर कचरा |  
           हाथों से गर्दन तक फूलों का गजरा  |

कोठे पर मन बैठा मंदिर में नरतन.....

          आशा तो फ्यूज बल्ब होल्डर में अटकी |
          जीत  हाथ  आते  ही मछली सी छटकी |

गले बँधी टाई सा हार का अपनपन ....
       

Thursday, March 10, 2011

फागुन के रस माते दोहे

       फगुनाया सूरज  उठा , अरुणिम बालस्वरुप |
       आँगन-आँगन बाँटता,  अँजुरी-अँजुरी   धूप |

       रजनी  रूप   सँवारती,  कजरे-कजरे    केश |
       बदरी-बदरी    चंद्रमा ,  आये   अपने     देश |

       गोरी  ठाढ़ी  द्वार  पर, पिय-पथ  रही  निहार |
       मदिरा-मदिरा नैन हैं ,  अंग-अंग   कचनार |

       कविता कामिनि के सभी ,टूट गए अनुबंध |
       दोहे    जैसी      देह     थी ,हुई  सवैया  छंद |

       फागुन गुन-गुन गा रहा, पिए गुनगुनी धूप |
       सरसों सरसों मन लगे , टेसू      टेसू    रूप |

       सूखि गयी लकड़ी भई,पिया मिलन की चाह |
       अब घर आ जा जोगिया,जोगिनि  देखे  राह |

       धवल चाँदनी सा  खिला,  गोरी   तेरा   रूप |
       इन्द्रधनुष  के  रंग,जब  पड़े  फागुनी   धूप |

       राग   और  वैराग में ,  रही  न   कोई  जंग |
       एक   रंग  दोनों  रँगे , पिए   दूधिया   भंग |

     नैन सैन,चितवन,चुभन, मान और मनुहार |
     अंगुरी दाबे  रस  चुवै,  गुझिया  जैसा  प्यार |

    फागुन में भी पिया जब, लिए न घर का हाल |
    भाभी   के   नैना   झरैं,   देवर   बना   रुमाल |

     फागुन  की सीढ़ी चढ़ा, फिसल  गया   वैराग |
     गिरा अनंगी रंग  में,  नस-नस  फूटी   आग |

     फागुन  वृन्दावन गयो , भूलि गयो निज  नाम |
     राधे-राधे  रमि   गयो,  वन-वन खोजत श्याम |

Saturday, March 5, 2011

कविता......, खर्चती साँसें......

                  कविता ..

     जो भी व्यक्त हो रही है 
     कविता नहीं है 
     कविता है वह 
     जो व्यक्त होना चाहते हुए भी
     अव्यक्त है
     बंद है अंतस में
     उस भँवरे की तरह
     जो साँझ होते ही
     बंद हो जाता है
     कमल की पंखुड़ियों में
     कविता और भँवरा
     दोनों को इंतज़ार है
     सुबह  के सूरज का  
     ताकि बंधनमुक्त हो
      उड़ सकें
     वे अपने
     उन्मुक्त आकाश में
     किन्तु दोनों के
     सूरज हैं अलग-अलग
     भँवरा
     मुक्त हो जाता है
     आते ही  
     अपने सूरज के
     पर कविता
     जीती है
     एक सतत घुटन
     अपने सूरज की
     अनवरत प्रतीक्षा में....

                  खर्चती साँसें.....

      बेवजह ही
     खर्च होती जा रही हैं
     जिंदगी की साँसे...
     उन
     फुटकर रुपयों की तरह
     जो नोट से टूटकर
     इस  महँगाई में
     जाने अनजाने
     राशन
    आलू-प्याज..
    की खरीदारी पर
    जेबों से खुद बखुद
    निकलकर
    खर्च हुए  जा रहे हैं....  


Thursday, March 3, 2011

महाशिवरात्रि पर ..भावी हू मेटि सकैं त्रिपुरारी

भाल पे चन्द्र जटाओं में गंग  सुकंठ  पे  ब्याल  रहा   फुफकारी |
हाथ त्रिशूल विराजत नाथ के   देवों  के देव  की है  छवि न्यारी |
वाम   सुसाजति   मातु महा   जननी जग की  जग पालनहारी |
और जो देव  करें  सो करें  पर   भावी  हू  मेटि  सकैं   त्रिपुरारी |


गौर शरीर पे भस्म  चिता की  ये बाबा जी  देखो  लगाये हुए हैं | 
तीनिहु लोक के मालिक आप   पहाड़ पे   धूनी   रमाये   हुए हैं |
वेश   असुंदर   धारे  हुए   पर   सुन्दर   सृष्टि    सजाये    हुए हैं |
आप  मे  विश्व समाया  हुआ पर   भक्तों  मे आप समाये  हुए हैं | 

Monday, February 28, 2011

नाक

( आज एक बाल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ जो  सन २००० में प्रकाशित मेरे बाल कविता संग्रह    'बिल्ली का  संन्यास' शीर्षक पुस्तक में संग्रहीत है )

 
मुखड़े   को  सुन्दरता   देती -
है,  चेहरे  पर   सुन्दर  नाक |
सारे   अंग   जरूरी    हैं , पर-
नहीं किसी से कमतर नाक | 

            दो काली  आँखों  के  नीचे ,
           बीचे  बांध   सरीखी  नाक |
           मुख  से  पहले ऊपर  बैठी ,
           छोटी हो या बड़ी सी  नाक |

देखो कितनी अच्छी लगती-
है , तोते  की ठोर   सी नाक |
अलग से जैसे छोपी लगती ,
होती  जो  कंडौर  सी  नाक |

         कोई  भिन्डी  जैसी  लम्बी ,
         कोई दबी सी चिपटी नाक |
         कोई  फैले   नथुनों  वाली ,
         ज्यों लुहार की भट्ठी नाक |

तरह-तरह आकारों  वाली ,
मोटी हो  या  पतली  नाक  |   
मुखड़े का  भूगोल बनाती ,
होती  बहुत  जरूरी  नाक |

          अच्छे काम सदा करते जो ,
          ऊँची  रहती   उनकी  नाक |
         बुरे  काम  करनेवालों   की ,
         बिना कटाए कटती   नाक  |

Thursday, February 24, 2011

....मेरी कविता

महल का कब ? सड़क का साथ करती है मेरी कविता |
वख्त  से  भी  तो  दो- दो  हाथ  करती है  मेरी कविता |

नफरतों   से  झगड़ती  है  तो  अम्नोंचैन  की  खातिर ,
जहाँ  में  प्रेम  का   उन्माद   भरती  है   मेरी  कविता |

नहाकर  चांदनी   में   ये   कभी   लगती   परी   जैसी ,
कभी  आगों  की  दरिया से  गुजरती है  मेरी  कविता |

रंग  पर  रंग  का  मौसम   फुहारें    घन-घटाओं   की ,
फाल्गुन   में  भी सावन  बन  बरसती है  मेरी  कविता |

अंधेरो  की   सियासत  से     अकेली  जूझती  भी  है ,
जुगनुओं की तरह पल पल चमकती है मेरी कविता ||

शहर की  तंग  गलियों में  घुटन की पीर  पी-पी  कर ,
खेत-खलिहान  के  रस्ते   विचरती है   मेरी  कविता |

थपेड़े     झेलती   है      काँपती      आँसू    बहाती  है '
रोज  पतझड़ के साये में   सँवरती  है   मेरी  कविता | 

Monday, February 21, 2011

लोकतंत्र को निगल गया भ्रष्टाचार का अजगर ..

हाँ ! मैं देख रहा हूँ | क्या आपने नहीं देखा ? आप भी देख रहे हैं | हम सब देख रहे हैं , मगर तमाशबीन की तरह | कुछ करना  भी चाहें तो क्या करें ? सिर्फ हो-हल्ला ही तो मचा सकते हैं | मचा भी रहे हैं मगर कोई असर नहीं |
हाँ , तो हम सबने देखा - काफी समय पहले से जिस भ्रष्टाचार के भीमकाय भयंकर अजगर ने  देश के लोकतंत्र को निगलना शुरू किया था , अब पूरा का पूरा निगल गया - सिर से पाँव तक ! लोकतंत्र अब अजगर के पेट में है | वह अजगर की आँखों से ही थोडा-बहुत बाहर देख लेता है , उसी की साँस पर जिन्दा है ,बाहर आने को छटपटाता है | अजगर के पेट में फँसा बेचारा हाथ-पाँव मारता है मगर दूसरे ही पल आँखें मूँद लेता है | एक आम आदमी की तरह मौत से जूझ रहा है - बेचारा बेबस लोकतंत्र ! लगता है कि अब जान गई कि तब , पर दूसरे ही क्षण वह फिर हरकत में आ जाता है | मृतप्राय है पर जिजीविषा बाकी है |
     क्या कोई चमत्कार होगा ? कोई मसीहा आएगा इसे बचाने ? कौन फाड़ेगा अजगर का पेट ? पेट फाड़कर लकवाग्रस्त हो चुके लोकतंत्र को बड़ी सावधानी से बाहर निकालेगा,उसके क्षतिग्रस्त अंगों की मरहम-पट्टी  करेगा , खुली हवा में बाहर घुमायेगा | धीरे-धीरे घायल लोकतंत्र स्वस्थ हो जायेगा | तब वह बेचारा नहीं रहेगा  |
अगर फिर कभी अजगर  उसे दुबारा निगलने का प्रयास करेगा तो वह अपनी चारों बलिष्ठ भुजाओं से उसके जबड़ों को पकड़कर फाड़ देगा | भ्रष्टाचार का अजगर हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगा | लोकतंत्र की घर-गृहस्थी फिर से बसेगी, उसके आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजेगी और वह बड़ी शान से सीना चौड़ा करके पूरे संसार को अपनी बलिष्ठता और स्वतंत्रता की चुनौती  देगा |