Thursday, September 30, 2010

---एक राम-रहमान

मालिक तो घट-घट  बसा   जग उसका विस्तार |
दीवारों    में     क़ैद     हैं     कुछ संकीर्ण विचार  |

मंदिर में    घंटा   बजे     मस्जिद में हो  अजान |
दोनों में क्या फर्क जब     एक       राम-रहमान |

प्रेमडोर   में है    बंधी      इक    दूजे   की   जान |
हिन्दू-मुस्लिम   बाद में     पहले      हैं     इंसान |

आओ कुछ ऐसा करें     पल-पल     उपजे   हर्ष  |
खड़ा हिमालय सा रहे    अपना          भारतवर्ष | 
 

Wednesday, September 29, 2010

खड़ा कबीरा अलख जगाता---

इधर-उधर  लड़ने से पहले खुद    अपने से    लड़कर देख |
किसी   परिंदे   जैसा  पहले    पर  फैलाकर    उड़कर  देख |
नफरत की  दीवार  ढहाकर     प्यार की   खेती-बारी   कर ,
हरियाली फिर चैनोअमन की वतन में अपने मुड़कर देख |
टूटी हुई    पतंग-जिन्दगी ,    बेमकसद     क्यों   ढोता है ?
उड़ेगा फिर से आसमान में     एक बार   तो  जुड़कर देख |
कण-कण में मालिक    बसता है     क़ैद नहीं    दीवारों में ,
मीरा औ रसखान की तरह   अपने  अन्दर   घुसकर देख |
धर्म के ठेकेदारों की परवाह न कर    बस  दिल की सुन ,
खड़ा कबीरा अलख जगाता   तू भी   शामिल होकर देख | 

Tuesday, September 28, 2010

परिंदा हूँ---

गुनगुनाता रहा गुनगुनाता रहूँगा |
सदा प्रेम  के  गीत   गाता  रहूँगा |
जो भी हो मौसम  कोई गम नहीं ,
परिंदा हूँ मै, आता - जाता रहूँगा |

आदमी

                       हँसता-रोता हुआ   आदमी |
                      खुद  को ढोता हुआ आदमी |
                      आसमान तक चढ़कर के भी '
                      कितना छोटा हुआ  आदमी |
                      दूर से चमके सोने सा , पर-  
                      सिक्का खोटा हुआ आदमी |
                      औरों के हिस्से खा-खाकर ,      
                      कितना मोटा हुआ आदमी |
                      जाग रहा है फिर भी लगता -
                      जैसे  सोता हुआ   आदमी  |    
                      चिकना है  पर बिन पेंदे का ,
                      जैसे  लोटा हुआ   आदमी | 

Monday, September 27, 2010

"---मैं हिन्दोस्तान हूँ "

         आरतों का अब   करुण क्रंदन न   होना चाहिए |
         विषधरों  के अंक में    चन्दन  न  होना चाहिए |
         गर प्रतिष्ठा है बचानी  हमको  अपने देश की, तो-
          दोस्त ! गद्दारों का अभिनन्दन न होना चाहिए | 

          हर तरफ छाया हुआ है धुआं काला-काला |
          देश  अब कौन  तेरी   फिक्र है   करने वाला |
          तेरे   टुकड़े  हज़ार  करने वाले हैं  तो बहुत ,
          कोई दिखता नहीं तेरी शान पे मरने वाला |

          दिल में सहेजे   दर्द का   सारा  जहान हूँ |
          चीखों से-कराहों से     भरा   आसमान हूँ |
          अपनों ने किया जर्जर फिर  भी महान हूँ |
          कवि नहीं हूँ दोस्त !   मैं हिन्दोस्तान हूँ |

Saturday, September 25, 2010

---वो इन्सान नहीं है

    कुर्सी के लिए देश की  इज्जत करे  नीलाम,
    गद्दार है  !  वतन का    निगहबान  नहीं है |
    छीनता है   मुल्क के   चैनोअमन     को जो ,
    हिन्दू नहीं- न सिख,  वो मुसलमान नहीं है |
    जिस गोद में  जन्मा है, उसी से   दगा करे ?
    वह है कपूत !   देश का    अपमान   वही है |
    धनवान है, बलवान है,सब कुछ है वह मगर,
    सौ बार     मैं कहूँगा -  वो    इन्सान नहीं है |

Friday, September 24, 2010

--लेखनी हमारी देशहित में लगी रहे

    चारों ओर फैली हुई आग अलगाव की है,
    ऐसा करो   ज्योति  देशप्रेम की  जगी रहे |
    एकता के सूत्र में   बंधा रहे    समूचा देश,
    प्रेमरस   में   सदा    मनुष्यता    पगी रहे |
    बकवेशधारियों को स्वार्थ के पुजारियों को,
    जड़ से मिटा दे    देख दुनिया   ठगी रहे |
    ज्योतिपुंज ऐसी ज्योति जिन्दगी को दे दे,
    सदा लेखनी हमारी देशहित में  लगी रहे |