Friday, February 10, 2012

अलौकिक सुन्दरी

संगमरमर की   तराशी मूर्ति  हो तुम ,
या   अजन्ता की   कोई जीवित   कला ।
याकि हो अभिशप्त उतरी मृत्युभू पर ,
देवबाला    हो    कि .........कोई  अप्सरा ।

शांत यमुना सी    सुकोमल सुमन सी ,
श्याम घन सम केश सुन्दर कामिनी ।
या कि.......... भादौं की अँधेरी रात में ,
चीर घन   चमकी हो   चंचल दामिनी ।

स्वर्ण   सी    काया   महक चन्दन  उठे ,
या   सुमन   की  मधुर मोहक गंध हो ।
या  मनुज-स्वप्नों   की  अद्भुत सुन्दरी ,
या किसी कवि का सरस मधु छंद हो ।  

Saturday, January 7, 2012

..वही कमीशनखोरी है

वही घूंस है , वही कमीशन खोरी है |
वही   गुंडई  कायम   सीनाजोरी है |
वही पुलिस की लूट वही दादागीरी |
वही  दलाली  छुटभैया   नेतागीरी |
वही गाँव बदहाल वही झोपड़पट्टी |
जहां धधकती है महँगाई की भट्ठी |

वोट के सौदागर,क्या ये सब बदलेंगे |
झूठे वादे करने हैं .......सो  कर  लेंगे |

पर  जनता  को  जागरूक  बन जाना है |
सोच समझकर वोट का बटन दबाना है |



Saturday, December 31, 2011

हर प्राणी सुख पाए नए साल में

कुछ ऐसा हो जाए  नए साल में |
मानवता मुस्काये  नए साल में |
भूखा कोई न सोये, इंसान  यहाँ ,
हर प्राणी सुख पाए नए साल में |
....   ......    ......   ......   ......  .....
नव वर्ष की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनायें .......

Friday, December 16, 2011

तीर से ना कमान से पूँछव

                      अवधी-गीतिका 

पूँछा चाहव  तौ शान से पूँछव |
देश  के   हुक्मरान   से पूँछव |

राजा  अन्दर-चिदंबरम बाहर,
चाल ! हाई कमान  से  पूँछव |

देश  माँ  बेईमानी  केतनी  है ?
पहिले अपने ईमान से पूँछव |

घाव पायन तौ सिर्फ अपनेन से,
तीर  से  ना  कमान   से  पूँछव |

देशभक्ती कै  काव मतलब है,
कौनों सीमप जवान से पूँछव |

तीर   कैसन  लगा  करेजे मा ,
कामिनी  के कमान से पूँछव |

हारे   नेता  कै  हाल   कैसन  है,
कौनौ कूकुर -किरान से पूँछव |

Thursday, December 1, 2011

(रिपोस्ट ..यह लघुलेख फरवरी २०११ में पोस्ट किया था | मन की आवाज़ पर पुनः पोस्ट कर रहा हूँ |)


लोकतंत्र को निगल गया भ्रष्टाचार का अजगर ..

हाँ ! मैं देख रहा हूँ | क्या आपने नहीं देखा ? आप भी देख रहे हैं | हम सब देख रहे हैं , मगर तमाशबीन की तरह | कुछ करना  भी चाहें तो क्या करें ? सिर्फ हो-हल्ला ही तो मचा सकते हैं | मचा भी रहे हैं मगर कोई असर नहीं |
हाँ , तो हम सबने देखा - काफी समय पहले से जिस भ्रष्टाचार के भीमकाय भयंकर अजगर ने  देश के लोकतंत्र को निगलना शुरू किया था , अब पूरा का पूरा निगल गया - सिर से पाँव तक ! लोकतंत्र अब अजगर के पेट में है | वह अजगर की आँखों से ही थोडा-बहुत बाहर देख लेता है , उसी की साँस पर जिन्दा है ,बाहर आने को छटपटाता है | अजगर के पेट में फँसा बेचारा हाथ-पाँव मारता है मगर दूसरे ही पल आँखें मूँद लेता है | एक आम आदमी की तरह मौत से जूझ रहा है - बेचारा बेबस लोकतंत्र ! लगता है कि अब जान गई कि तब , पर दूसरे ही क्षण वह फिर हरकत में आ जाता है | मृतप्राय है पर जिजीविषा बाकी है |
     क्या कोई चमत्कार होगा ? कोई मसीहा आएगा इसे बचाने ? कौन फाड़ेगा अजगर का पेट ? पेट फाड़कर लकवाग्रस्त हो चुके लोकतंत्र को बड़ी सावधानी से बाहर निकालेगा,उसके क्षतिग्रस्त अंगों की मरहम-पट्टी  करेगा , खुली हवा में बाहर घुमायेगा | धीरे-धीरे घायल लोकतंत्र स्वस्थ हो जायेगा | तब वह बेचारा नहीं रहेगा  |
अगर फिर कभी अजगर  उसे दुबारा निगलने का प्रयास करेगा तो वह अपनी चारों बलिष्ठ भुजाओं से उसके जबड़ों को पकड़कर फाड़ देगा | भ्रष्टाचार का अजगर हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म हो जायेगा | लोकतंत्र की घर-गृहस्थी फिर से बसेगी, उसके आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजेगी और वह बड़ी शान से सीना चौड़ा करके पूरे संसार को अपनी बलिष्ठता और स्वतंत्रता की चुनौती  देगा |

Friday, November 18, 2011

चल मेरे मीत नदी-तीर चलें

संग-सँग  राँझा  चलें , हीर  चलें |
चल  मेरे  मीत   नदी -तीर चलें |

चलें कुंजों की घनी छावों में |
प्यार  के  रंग  भरे गाँवों  में |
मस्त भँवरे हैं, गुनगुनाते हैं |
रस में डूबे हैं , गीत  गाते हैं |

दिल की तनहाइयों को चीर, चलें |

समां   बसंत   की   सुहानी है |
जहाँ    महकती   रातरानी है |
चाँदनी धरा-तल पे बिखरी है |
रूप  की  धवलपरी   उतरी है |

ऐसे में मन को कहाँ धीर ? चलें |

परिंदे    प्रेम-धुन     सुनाते हैं |
सैकड़ों    तारे     मुस्कराते हैं |
लताएँ    झूम-झूम   जाती हैं |
डालियाँ   चूम-चूम   जाती हैं |

प्यार  के  डोर बंधी पीर, चलें |

सिर्फ हरियाली ही हरियाली है |
हाय,  कैसी   छटा   निराली है !
कोई   बंदिश  है  ना  बहाना है |
एक   दूजे   में    डूब   जाना है |

आज हम तोड़ के जंजीर चलें |

Wednesday, November 2, 2011

प्यास तो सिर्फ प्यास होती है

जिंदगी   जब    उदास  होती  है |
तू    मेरे   आस-पास    होती  है |
बुझ गई गर  तो प्यास ही कैसी , 
प्यास तो   सिर्फ प्यास  होती है |

तू जहाँ पर थी वहीँ , पदचिन्ह  तेरे  ढूंढता हूँ |
तू गयी पर मैं तेरी,यादों से तुझको पूंछता हूँ |

एक  ज़माना  पहले  जैसी, अब  भी  लगती हो |
आँखों  ही  आँखों  में   बातें,  करती   लगती हो |
चाल वही-मुस्कान वही- नज़रों  का  बाँकापन ,
उम्र न कुछ कर सकी,उम्र को ठगती लगती हो |